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“यूनिवर्सल बेसिक इनकम”

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी द्वारा हाल ही में देश के लगभग पांच करोड़ ग़रीब परिवारों को सालाना बहत्तर हज़ार रुपए की न्यूनतम आय देने की घोषणा की गयी है जिसे ‘न्यूनतम आय योजना’ (न्याय) नाम दिया गया है। जोकि “यूनिवर्सल बेसिक इनकम” (UBI) से प्रेरित है। इसके कारण एक बार फिर “यूनिवर्सल बेसिक इनकम” (UBI) चर्चा में आ गई है।

भारत में साल 2016-17 के आर्थिक सर्वेक्षण में भी इसको लेकर सिफारिश की गई थी जिसमें कहा गया था कि केंद्र सरकार द्वारा चलाई जा रही कुल 950 योजनाओं पर जीडीपी का क़रीब 5 फ़ीसदी ख़र्च होता है। इस योजनाओं का विकल्प यूबीआई हो सकता है। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के अनुसार, भारत में दो दशकों में ग़रीबों की दैनिक आय में केवल 78 रुपए की बढ़ोतरी हुई है। इसके मुताबिक़, भारत में 1993-94 में सांसद, विधायकों, उच्च अधिकारीयों की दैनिक औसत आय 530 रुपए से बढाकर 2011-12  में 1052 रुपए हो गई। जबकि कृषि क्षेत्र में यह बढ़ोतरी 120 से 170 रुपए तक ही पहुंच पाई। दूसरी ओर मशीन ऑपरेटर की आय 176 से बढ़कर 254 रुपए पर आ गई। अर्थात् दो दशकों में केवल 78 रुपए की ही वृद्धि हुई।

1526 में आया था पहला प्रस्ताव:

दरअसल, विकसित देशों में 16वीं शताब्दी से ही यूबीआई विषय पर चर्चा शुरू हो गई थी। इसी दौरान विचारक थॉमस मोर ने इंग्लैंड में चोरी-डकैती पर रोक लगाने के लिए यूबीआई की सिफारिश की थी।    यूबीआई का प्रस्ताव पहली बार 1526 में बेल्जियम में दिया गया था। 1526 में जोहानस लूडोविकस वाइव्स (Johannes Ludovicus Vives) ने बेल्जियम के ब्रुग शहर में इसका विचार रखा था। बड़े-बड़े विचारकों जैसे थॉमस मोर, थॉमस पेन, जॉन मिल और बर्ट्रेंड रसेल ने भी इस सिद्धांत की वकालत की। तब से लेकर अब तक अमेरिका सहित विश्व के अनेक देशों में इसे पूरी तरह या टुकड़ों में लागू करने की सिफारिशें होती रही हैं।

विभिन्न देशों में हुई कोशिशें:

  • अमेरिका: वर्ष 1970 में अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने यूबीआई पर क़ानून बनाने की कोशिश की जिसके लिए डेनवर और सिएटल जैसे शहरों में योजना को लागू करने का ट्रायल भी किया गया लेकिन वह नाकाम रहा।
  • स्विट्ज़रलैंड: वर्ष 2016 में स्विट्ज़रलैंड में यूबीआई को लागू करते हुए सबको ढाई हज़ार फ्रैंक प्रतिमाह दिए जाने की मांग की गई थी। इसके लिए आन्दोलनकर्ताओं द्वारा एक जनमत संग्रह की मांग की गई। यूबीआई की मांग के लिए चले इस आन्दोलन में लोगों ने सरकार पर दबाव बनाने के लिए वहां की आबादी के बराबर 5 सेंट के 80 लाख सिक्के इकट्ठे करके संसद भवन के सामने बिखेर दिए थे। स्विस सरकार ने जनता से इस प्रस्ताव का विरोध करने की अपील की और 76.9 फ़ीसदी जनता द्वारा यह कहकर इस प्रस्ताव को ख़ारिज कर दिया गया की देश की मौजूदा सामाजिक कल्याण व्यवस्था उपयुक्त है।
  • फ़िनलैंड: 2017-18 के मध्य फ़िनलैंड में दो हज़ार लोगों पर 634 डॉलर प्रतिमाह देने का पायलट प्रोजेक्ट चलाया गया। इसके बाद उन लोगों के स्वास्थ्य और जीवनशैली में सुधार देखा गया किन्तु उनमें से कोई भी अपने लिए रोज़गार ढूंढने में कामयाब नहीं हो सका। जबकि काम ही इस प्रोजेक्ट का मुख्य उद्देश्य था। 

‘डेवलपिंग इकॉनमी में यूनिवर्सल बेसिक इनकम’ पर एमआईटी की रिपोर्ट:

फरवरी 2019 में ‘डेवलपिंग इकॉनमी में यूनिवर्सल बेसिक इनकम’ शीर्षक से एमआईटी की एक ताज़ा रिपोर्ट आई। इस रिपोर्ट में यूबीआई के तीन प्रयोगों का उल्लेख किया गया था जोकि भारत के मध्य प्रदेश, नामीबिया और ईरान में हुए थे। मध्य प्रदेश की एक पंचायत में पायलट प्रॉजेक्ट के तौर पर ऐसी स्कीम को लागू किया गया था। इंदौर के 8 गांवों की 6,000 की आबादी के बीच 2010 से 2016 के बीच इस स्कीम का प्रयोग किया गया। इसमें पुरुषों और महिलाओं को 500 और बच्चों को हर महीने 150 रुपये दिए गए। मध्य प्रदेश में चले इस प्रयोग के सन्दर्भ में लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स के प्रो. गाय स्टैंडिंग का मानना था कि प्रयोग किये गए परिवारों में बच्चों की स्थिति में काफी सुधर पाया गया।

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