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PriyaGold बिस्किट नेपाल में BAN…सिस्टम पर सवाल!

नेपाल ने भारत में बनने वाले PriyaGold बिस्किट को अपने यहाँ Ban कर दिया है। क्योंकि PriyaGold बिस्किट बनाने वाली भारतीय कंपनी Surya Food and Agro Ltd. पर बिस्किट बनाने में पशु-चारे के लिए निर्धारित भूसा या चोकर इस्तेमाल करने का आरोप लगा है। इसके बाद न सिर्फ़ कंपनी का खाद्य लाइसेंस रद्द कर दिया गया बल्कि उसके खिलाफ क़ानूनी कार्रवाई भी शुरू कर दी गई है।

लेकिन इस पूरी ख़बर में असली ट्विस्ट ये है कि इस बिस्किट की पोल किसी विदेशी एजेंसी ने नहीं, बल्कि भारत की अपनी ही खाद्य सुरक्षा एजेंसी FSSAI की कार्रवाई ने खोली है। यानी जिस मामले पर पड़ोसी देश ने कदम उठाया, उसकी गंभीरता पर सवाल भारत के नियामक ने ही उठाए हैं।

इसीलिए PriyaGold मामले में नेपाल के खाद्य प्रौद्योगिकी एवं गुणवत्ता नियंत्रण विभाग यानी FTQCD ने भारतीय नियामक की कार्रवाई को ही आधार बनाकर एक नोटिस जारी किया है जिसमें बिस्किट्स को घटिया गुणवत्ता वाला बताते हुए इन के आयात, बिक्री और वितरण पर प्रतिबंध लगा दिया। साथ ही बाजार में मौजूद स्टॉक वापस मँगाने के निर्देश भी दिए हैं।

अब सवाल ये है कि अगर हमारे यहाँ खाने-पीने की चीजों की जाँच करने के लिए पूरा सिस्टम मौजूद है, तो ये कमियाँ सामने आने तक इंतज़ार किस बात का?

क्या FSSAI अब पहले से ज़्यादा मुस्तैद हो गया है? अगर हाँ, तो अच्छी बात है। लेकिन एक सवाल और है—अगर आज इतनी सख्ती दिखाई जा रही है, तो कल तक निगरानी में क्या कमी रह गई थी?

क्योंकि बात महज़ बिस्किट तक ही सीमित नहीं है। कभी दूध, कभी किशमिश और कभी दूसरे खाद्य उत्पादों को लेकर भी मिलावट की खबरें सामने आ रही हैं।

और जनता को सिर्फ ये जानने में दिलचस्पी नहीं है कि आज क्या नक़ली पकड़ा गया। जनता ये भी जानना चाहती है कि जिस चीज को वो रोज़ खा रहे हैं, उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करने की ज़िम्मेदारी आखिर किसकी है? इस मामले ने खाद्य उत्पादों के निर्माण, गुणवत्ता नियंत्रण और नियामकीय निगरानी के महत्त्व को फिर सवालों के घेरे में ला दिया है।

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अब पूरे मामले को समझिए।

रिपोर्ट्स के मुताबिक़, एक उपभोक्ता की शिकायत के बाद किए गए निरीक्षण में भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण यानी FSSAI ने Surya Food and Agro Ltd. की फैक्ट्री में छापा मारा तो वहाँ खाद्य सुरक्षा और स्वच्छता से जुड़ी गंभीर कमियाँ पाईं। FSSAI ने जाँच के दौरान पाया कि कंपनी बिस्किट बनाने में ‘कैटल फीड ब्रैन’ यानी मवेशियों को खिलाया जाने वाला भूसा या चोकर का इस्तेमाल कर रही थी। पाए गए भूसे से भरे बोरे जानवरों के चारे के लिए चिह्नित थे, न कि इंसानों के इस्तेमाल के लिए।  

FSSAI के निरीक्षण में कच्चे माल के भंडारण, कीट नियंत्रण और साफ-सफाई से जुड़ी कमियाँ भी दर्ज की गईं। इसके बाद कंपनी का लाइसेंस निलंबित कर दिया गया है।

लेकिन ज़रा सोचिए।

आप और हम रोज़ कई चीज़ें दुकान से खरीदते हैं, पैकेट पर ब्रांड का नाम देखते हैं, कीमत देखते हैं, expiry date देखते हैं और सामान घर ले आते हैं।

लेकिन ग्राहक के पास न तो फैक्ट्री के अंदर झाँकने का कोई तरीका है, न ही हर बार इस्तेमाल हुए कच्चे माल की जाँच करने की सुविधा। इसीलिए तो खाद्य सुरक्षा के नियम बनाए जाते हैं। और नियामक संस्थाएँ होती हैं। इसीलिए हमें भरोसा होता है कि कंपनियाँ नियमों का पालन करेंगी क्योंकि निगरानी करने वाली संस्था यह सुनिश्चित करेगी कि बाज़ार में सुरक्षित खाद्य उत्पाद ही पहुँचे।

लेकिन जब शिकायत के बाद निरीक्षण होता है और उसमें इतनी गंभीर कमियाँ सामने आती हैं, तो सवाल सिर्फ यह नहीं होता कि गलती किसने की। सवाल यह भी होता है कि निगरानी का सिस्टम इससे पहले क्या कर रहा था।

PriyaGold Biscuit अकेला ऐसा मामला नहीं है…

अक्टूबर 2026 में ही सामने आई दूसरी रिपोर्टों पर भी नजर डालिए। FSSAI ने और भी कंपनियों के खिलाफ खाद्य सुरक्षा उल्लंघनों को लेकर क़ानूनी कार्रवाई शुरू की है। इनमें Dodla Dairy के फुल क्रीम दूध के नमूने में डिटर्जेंट या कास्टिक सोडा पाया गया… इसके अलावा, UEIR Organic Foods नामक कंपनी की पीली किशमिश में भी कीटनाशक अवशेषों को निर्धारित सीमा से अधिक पाया गया…ये तो महज़ कुछ नाम हैं गौर करेंगे तो लिस्ट लंबी निकलेगी..

लेकिन इन सबसे एक बड़ा सवाल ज़रूर बनता है। वो ये कि क्या खाद्य सुरक्षा व्यवस्था अब पहले से ज्यादा सख्ती से काम कर रही है? अगर हाँ, तो यह अच्छी बात है। लेकिन क्या हमें यह नहीं पूछना चाहिए कि इन कमियों का पता पहले क्यों नहीं चलता?

क्योंकि खाद्य सुरक्षा के लिए कानून हैं, मानक हैं, निरीक्षण करने वाली एजेंसियाँ हैं और उल्लंघन होने पर कार्रवाई का प्रावधान भी है। लेकिन किसी नियम का होना और उसका ज़मीनी स्तर पर प्रभावी ढंग से लागू होना— दोनों अलग बातें हैं।

खाद्य सुरक्षा एजेंसी का निरीक्षण करना, नमूने लेना और नियमों का उल्लंघन मिलने पर कार्रवाई करना उसकी जिम्मेदारी है। और जब ऐसी कार्रवाई होती है, तो इसे व्यवस्था की सक्रियता के रूप में देखा जाता है। लेकिन दूसरी तरफ, जब निरीक्षण में गंभीर कमियाँ सामने आती हैं, तो निगरानी की प्रभावशीलता पर सवाल उठना भी तो लाज़मी है।

FSSAI ने मार्च 2026 में संसद को दी गई जानकारी में बताया था कि वित्त वर्ष 2022–23 से 2024–25 के दौरान कुल 5,18,559 नमूनों का विश्लेषण किया गया। जिसमें 88,192 मामलों में दंड का निर्णय लिया गया, 3,614 मामलों में दोष सिद्ध हुए और 1,161 लाइसेंस रद्द किए गए।

मतलब, खाद्य सुरक्षा की निगरानी और प्रवर्तन पूरे साल चलते हैं। और ऐसा नहीं है कि पहले कोई जाँच होती ही नहीं। बल्कि इससे सवाल और गंभीर हो जाता है—जब निरीक्षण और निगरानी पहले से चल रहे थे, तो फिर ऐसे गंभीर उल्लंघन सामने आने से पहले पकड़ में क्यों नहीं आए?

FSSAI कहता है कि खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006 के तहत खाद्य सुरक्षा उल्लंघनों और जन स्वास्थ्य से समझौता करने के प्रति उसकी ज़ीरो टॉलरेंस नीति है।

तो अगर अब निगरानी को और सख्त किया जा रहा है, तो क्या इस सख्ती को लगातार बनाए रखने की कोई गारंटी है? सिस्टम का काम सिर्फ गड़बड़ी मिलने पर अपनी सक्रियता दिखाना नहीं, बल्कि ऐसी गड़बड़ी होने की संभावना को कम करना भी तो है।

इस पूरे मामले में तीन बातें साफ हैं।

पहली, खाद्य सुरक्षा के नियमों का उल्लंघन गंभीर विषय है।

दूसरी, नियामक संस्थाओं का निरीक्षण करना और उल्लंघन सामने आने पर कार्रवाई करना जरूरी है।

और तीसरी, कार्रवाई के साथ यह समीक्षा भी जरूरी है कि निगरानी में कमी कहाँ रही और भविष्य में ऐसी घटनाओं को कैसे रोका जा सकता है।

क्योंकि आम उपभोक्ता जब बाजार से बिस्किट, दूध या किशमिश खरीदता है, तो वह हर पैकेट की प्रयोगशाला में जाँच नहीं कर सकता। वह भरोसा करता है कि नियमों का पालन हो रहा है और निगरानी करने वाली संस्थाएँ अपना काम कर रही हैं।

इसलिए असली उपलब्धि सिर्फ यह नहीं होगी कि कितनी फैक्ट्रियों पर छापे पड़े, कितने नमूने जाँचे गए या कितनी कंपनियों पर कार्रवाई हुई। असली उपलब्धि तब होगी, जब नियमों का पालन लगातार हो, गंभीर कमियाँ समय रहते पकड़ी जाएँ और उपभोक्ता को बार-बार ऐसी खबरों से यह न सोचना पड़े कि आखिर वह जो खा रहा है, इसमें कहीं कुछ हानिकारक मिलावट तो नहीं?

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